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NCERT Class 6 Hindi Chapter 5

रहीम के दोहे (Rahim Ke Dohe)

इस पाठ में मध्यकालीन हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि रहीम (अब्दुर्रहीम खानखाना) के दोहों का संकलन है जो जीवन की व्यावहारिक सच्चाइयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं। इन दोहों में मित्रता, परोपकार, विनम्रता, समय का सदुपयोग, और संकट में धैर्य जैसे विषयों पर गहरी नीति संबंधी शिक्षा दी गई है। रहीम के दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने वे सैकड़ों वर्ष पहले थे।

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Key Terms

दोहा
हिंदी कविता का एक छंद जिसमें दो पंक्तियाँ होती हैं, पहली पंक्ति में 13 और दूसरी में 11 मात्राएँ होती हैं।
नीति
जीवन में सही आचरण और व्यवहार के लिए बनाए गए सिद्धांत या नियम।
परोपकार
दूसरों की निःस्वार्थ भाव से सहायता करना और उनकी भलाई के लिए काम करना।
विनम्रता
अहंकार रहित होकर दूसरों के साथ शालीनता और सम्मान से व्यवहार करने का गुण।
मध्यकाल
भारतीय इतिहास का वह काल (लगभग 600-1700 ई.) जिसमें रहीम, कबीर, तुलसी जैसे महान कवि हुए।

Frequently Asked Questions

रहीम कौन थे?

रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। वे मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक और उनके संरक्षक बैरम खाँ के पुत्र थे। वे एक महान योद्धा, कूटनीतिज्ञ और हिंदी के अमर कवि थे। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों संस्कृतियों को अपने दोहों में समाहित किया।

रहीम के दोहों में कौन-कौन से विषय हैं?

रहीम के दोहों में मित्रता का महत्त्व, संकट में धैर्य रखना, परोपकार की महिमा, विनम्रता का गुण, समय का सदुपयोग, सज्जन और दुर्जन में अंतर, तथा जीवन की नश्वरता जैसे विषय मिलते हैं।

रहीम के एक प्रसिद्ध दोहे का अर्थ बताइए।

'रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।' – इस दोहे का अर्थ है कि प्रेम का रिश्ता धागे की तरह नाजुक होता है। इसे झटके से कभी मत तोड़ो। अगर एक बार टूट जाए तो फिर जुड़ता नहीं और जुड़े तो भी उसमें गाँठ पड़ जाती है।

रहीम के दोहे आज भी प्रासंगिक क्यों हैं?

रहीम के दोहे आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि उनमें जो मानवीय मूल्य और जीवन-दर्शन है वह शाश्वत है। मित्रता, विनम्रता, परोपकार, सत्य, और धैर्य जैसे मूल्य हर काल में महत्त्वपूर्ण रहे हैं और रहेंगे।

दोहा छंद की क्या विशेषता है?

दोहा हिंदी का लोकप्रिय मात्रिक छंद है। इसमें दो पंक्तियाँ (चरण) होती हैं। पहली पंक्ति में 13 मात्राएँ और दूसरी में 11 मात्राएँ होती हैं। यह छंद संक्षिप्त होते हुए भी गहरी बात कहने में सक्षम है। कबीर, रहीम और बिहारी जैसे कवियों ने इस छंद में अमर रचनाएँ की हैं।

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